जो फिल्म को घेरता है — ट्रेलर, पोस्टर, मेकिंग-ऑफ, साक्षात्कार, समीक्षाएं। पहले फ्रेम से पहले दर्शकों की धारणा तय करता है।
फ़्रेमिंग टेक्स्ट/पेरीटेक्स्ट
आपकी फ़िल्म एक सेकंड भी चलने से पहले, दर्शक ट्रेलर, फ़िल्म पोस्टर, सोशल मीडिया के छोटे-छोटे क्लिप, कलाकारों के साथ इंटरव्यू के ज़रिए एक उम्मीद बना लेते हैं। यह पूरा आवरण (enclosure) फ़िल्म तक पहुँच को काफ़ी हद तक तय करता है। सेट पर आपको इसका एहसास कम ही होता है; एडिटिंग और मार्केटिंग में यह गेम-चेंजर बन जाता है।
फ़्रेमिंग सामग्री — जिसे सिद्धांतकार पेरीटेक्स्ट कहते हैं — एक विज़ुअल और नैरेटिव पूर्व-अपेक्षा (pre-expectation) की तरह काम करती है। जंप-स्केयर (jump-scares) वाला एक थ्रिलर ट्रेलर दर्शक के दिमाग को इस कदर प्रभावित करता है कि फ़िल्म में पूरी तरह से सूक्ष्म (subtle) दृश्यों को देखकर भी वह चौंक जाता है। मुख्य अभिनेत्री के बारे में दिल दहला देने वाली कहानियों वाला एक मेकिंग-ऑफ़ (making-of) उसके प्रदर्शन की भावनात्मक व्याख्या को रंग देता है। निर्देशक का अपने काम पर एक आलोचनात्मक इंटरव्यू कुछ प्रतीकों पर ध्यान केंद्रित करता है — या उन्हें पूरी तरह से गलत दिशा में ले जाता है। आप सबसे अच्छा दृश्य शूट कर सकते हैं; यदि प्री-रिपोर्टिंग (pre-reporting) उसे पूरी तरह से गलत तरीके से फ्रेम करती है, तो दर्शक उसे विकृत नज़र से देखेंगे।
व्यवहार में इसका मतलब है: ट्रेलर और पोस्ट-कैंपेन (post-campaign) फ़िल्म को प्रभावित नहीं करते, लेकिन उसके रिसेप्शन (reception) को बहुत ज़्यादा प्रभावित करते हैं। एक हॉरर फ़िल्म जिसे आर्थहाउस ड्रामा (arthouse drama) के रूप में प्रचारित किया जाता है, उसे उसी फ़िल्म से अलग देखा जाएगा जिसका मार्केटिंग खून-खराबे और झटके वाले (blood-and-shock) तरीके से किया गया हो। इंटरव्यू स्पॉइलर (spoilers) बता सकते हैं या ऐसी उम्मीदें जगा सकते हैं जो बाद में पूरी नहीं होतीं। और क्रेडिट्स (credits) — वे भी इसमें शामिल हैं — बाद में भी असर डालते हैं: यदि किसी स्टार निर्देशक का नाम आखिरी सीन के बाद आता है, तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अलग होता है, बजाय इसके कि वह शुरुआत में प्रमुखता से दिखाया जाए।
डीओपी (DoP) के तौर पर यह आपके लिए इसलिए मायने रखता है, क्योंकि आपको यह समझना होगा कि आपकी विज़ुअल स्टाइल को पेरीटेक्स्ट (peritextual) द्वारा कैसे पूर्व-स्थापित (pre-positioned) या पश्च-स्थापित (post-positioned) किया जाता है। एक गहरा, दानेदार ब्लैक-एंड-व्हाइट (black-and-white) पोस्टर दर्शकों को एक रंगीन मार्केटिंग कट (marketing cut) की तुलना में अलग तरह से तैयार करता है जिसमें सैचुरेशन (saturation) को ऑप्टिमाइज़ (optimize) किया गया हो। और इसके विपरीत: यदि मार्केटर (marketers) आपकी लुक को प्री-एडवांस (pre-advance) के लिए बड़े पैमाने पर विकृत करते हैं, तो असली फ़िल्म निराशाजनक होगी। यह कोई सैद्धांतिक खेल नहीं है — यह बॉक्स ऑफिस (box office) और समीक्षाओं (reviews) में सफलता और असफलता तय करता है।
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क्विज़
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