पाथे की दो-परत रंगीन फिल्म (1929–1950s) — लाल/हरी चैनल, विशेष प्रकाश की आवश्यकता। द्विवर्णी प्रक्रिया दृश्य रंग बिंदुओं के साथ।
पाथेकलर (Pathécolor) एक दो-परत (two-layer) प्रणाली पर काम करता था, जो बाद में मानक बने आरजीबी (RGB) प्रणालियों से मौलिक रूप से भिन्न थी। फिल्म में दो इमल्शन परतें एक-दूसरे पर रखी जाती थीं - एक लाल के प्रति संवेदनशील, दूसरी हरे के प्रति। नीला रंग इन दोनों चैनलों के घटाव मिश्रण (subtractive mixing) से उत्पन्न होता था, जिससे विशिष्ट रंग विस्थापन (color shifts) होते थे। डाइक्रोइक प्रक्रिया (dichroic process) में विशेष दर्पणों और फिल्टरों का उपयोग कैमरे में किया जाता था, ताकि प्रकाश को दोनों परतों पर निर्देशित किया जा सके - यह एक संरचनात्मक रूप से जटिल समाधान था, जिसके सेट पर तत्काल परिणाम होते थे।
जो लोग पाथेकलर से शूटिंग करते थे, उन्हें अत्यधिक प्रकाश की आवश्यकता होती थी। इमल्शन धीमे थे, प्रकाश किरण के ऑप्टिकल विभाजन (optical splitting) से अतिरिक्त तीव्रता की हानि होती थी। छायाकार (cinematographers) उन स्पॉटलाइट इंस्टॉलेशन के बारे में बताते हैं जो आज 4K फुटेज के लिए आरक्षित होंगे - यह सब एक ऐसी छवि के लिए था जो मॉनिटर पर नीली या हरी दिख सकती थी। यह फिल्म 1929 से बाजार में आई और 1950 के दशक तक इस्तेमाल की गई, खासकर फ्रांस में, जहां पाथे (Pathé) ने इस तकनीक को बढ़ावा दिया। ब्रिटिश और अमेरिकी स्टूडियो ने बहुत पहले ही थ्री-स्ट्रिप टेक्नीकलर (Three-Strip Technicolor) का उपयोग करना शुरू कर दिया था, जिसने अपनी जटिलताओं के बावजूद अधिक स्थिर रंग प्रदान किए।
पाथेकलर के दृश्यमान रंग के दाग (color casts) आज शुरुआती यूरोपीय रंगीन फिल्मों की एक शैलीगत पहचान हैं - अक्सर छाया में एक जलीय हरापन, हाइलाइट्स में अत्यधिक लाल रंग। यह कोई रचनात्मक प्रभाव नहीं था, बल्कि प्रणाली की भौतिक सीमा थी। संपादन (editing) में इन रंग डोमेन (color domains) को न्यूनतम रूप से ठीक किया जा सकता था, लेकिन केवल ऑप्टिकल समायोजन (optics) या (बाद में) ऑप्टिकल प्री-एक्सपोजर (optical pre-exposure) के माध्यम से। आधुनिक बहाली (restoration) के लिए पाथेकलर नेगेटिव (negatives) खतरनाक होते हैं: दो-परत की जानकारी आधुनिक फिल्म की तुलना में पूरी तरह से अलग तरह से एन्कोड की जाती है - रंग पृथक्करण (color separations) की पुनर्गणना करनी पड़ती है।
व्यावहारिक रूप से प्रासंगिक अंतर: पाथेकलर कैमरे के लिए नेगेटिव फिल्म थी, न कि उस युग की कुछ रंग प्रक्रियाओं की तरह रिवर्सल (reversal)। इसने प्रयोगशाला रासायनिक सुधारों (lab chemical corrections) को संभव बनाया, लेकिन निर्माण और संचालन में अधिक जटिल भी था। आज यह प्रणाली पूरी तरह से अप्रचलित है, लेकिन इसका सांस्कृतिक-ऐतिहासिक मूल्य है - जो 1930-1940 के दशक की फ्रांसीसी या इतालवी रंगीन फिल्मों को प्रामाणिक रूप से डिजिटाइज़ करना चाहता है, उसे पाथेकलर की विशेषताओं को समझना होगा और अक्सर "सुधारने" के बजाय जानबूझकर पुनर्निर्माण करना होगा।
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क्विज़
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