तकनीकी विवरण
ये रॉड 1.5 मीटर से 6 मीटर की मानक लंबाई में निर्मित होते हैं, जिनमें 3 मीटर और 4.5 मीटर सबसे आम आयाम हैं। कनेक्शन 48 मिमी के उद्घाटन वाले रॉड क्लैंप (Clamps) या निर्बाध विस्तार के लिए कोनिकल-कपलर (Conical-Couplers) के माध्यम से किए जाते हैं। उच्च-गुणवत्ता वाले संस्करणों में एनोडाइज्ड एल्यूमीनियम (5 मिमी दीवार की मोटाई) का उपयोग किया जाता है, जबकि बजट-संस्करणों में गैल्वेनाइज्ड स्टील का उपयोग किया जाता है। ग्रीनस्क्रीन (Greenscreen) निर्माण के लिए विशेष स्टूडियो रॉड को प्रतिबिंब से बचने के लिए मैट ब्लैक कोटिंग (matte black coating) दी जाती है। भार वहन क्षमता समान भार वितरण के साथ प्रति मीटर 150 किग्रा (एल्यूमीनियम) और 300 किग्रा (स्टील) के बीच भिन्न होती है।
इतिहास और विकास
यह प्रणाली 1947 में पिनवुड स्टूडियो (Pinewood Studios) में स्टूडियो प्रकाश व्यवस्था की बढ़ती जटिलता के जवाब में उत्पन्न हुई। इसके विकासकर्ता इंजीनियर थॉमस मोल (Thomas Mole) और पीटर रिचर्डसन (Peter Richardson) थे, जो कुशल प्रकाश रिगिंग (Lighting Rigging) के लिए एक सार्वभौमिक ग्रिड प्रणाली (Grid System) की तलाश में थे। 1952 में SMPTE ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 48 मिमी व्यास को मानकीकृत किया। 1970 के दशक से, एल्यूमीनियम मिश्र धातुओं ने हल्के निर्माण को संभव बनाया, जबकि 1990 के दशक में डिजिटलीकरण ने अतिरिक्त केबल रूटिंग (Kabelführungen) को एकीकृत किया। आधुनिक स्टूडियो रॉड 2010 से LED प्रकाश व्यवस्था के लिए DMX केबलिंग (DMX-Verkabelung) और पावर रेल (Power-Schienen) को एकीकृत कर रहे हैं।
फिल्मों में व्यावहारिक उपयोग
ब्लैड रनर 2049 (Blade Runner 2049) (2017) में, डीओपी रोजर डीकिंस (DoP Roger Deakins) ने वालेस-कॉर्पोरेशन (Wallace-Corporation) दृश्यों में सटीक प्रकाश मार्गदर्शन के लिए 12x8 मीटर की स्टूडियो रॉड ग्रिड का उपयोग किया। मानक कार्यप्रवाह: शूटिंग शुरू होने से पहले प्रकाश योजना (Lighting Plan) के अनुसार रॉड लगाए जाते हैं, क्लैंप (Clamps) का उपयोग करके स्पॉटलाइट (Scheinwerfer) लगाए जाते हैं और पैंटोग्राफ (Pantographen) का उपयोग करके ऊंचाई-समायोज्य (höhenverstellbar) स्थिति में रखा जाता है। इसका लाभ यह है कि तिपाई (Stativ) बदले बिना तेजी से पुन: स्थिति निर्धारण किया जा सकता है, जबकि नुकसान सीमित ऊर्ध्वाधर समायोजन (vertikales Adjustment) है। कैमरा मूवमेंट (Kamerabewegungen) के लिए, स्लाइडर सिस्टम (Slider-Systeme) सीधे रॉड पर लगाए जाते हैं, जैसा कि द शाइनिंग (The Shining) (1980) में गलियारे की यात्राओं (Korridor-Fahrten) में था।
तुलना और विकल्प
स्टूडियो रॉड अपने सटीक सहनशीलता (Toleranzen) और मीडिया इंटरफेस (Medienschnittstellen) के कारण मचान (Scaffolding) से भिन्न होते हैं। ट्रस सिस्टम (Truss-Systeme) उच्च भार क्षमता (500 किग्रा/मी तक) प्रदान करते हैं, लेकिन अधिक जटिल असेंबली की आवश्यकता होती है। आधुनिक विकल्प रेल सिस्टम (Rail Systems) हैं जिनमें एकीकृत बिजली आपूर्ति (Stromversorgung) और स्वचालित स्थिति निर्धारण (automatisierter Positionierung) होती है, जैसे कि सिनेमा फ्लो सेलेब सिस्टम (Kino Flo Celeb-System)। कम बजट वाली प्रस्तुतियों के लिए सी-स्टैंड (C-Stands) को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि हाई-एंड स्टूडियो रोबोटिक ग्रिड सिस्टम (robotische Grid-Systeme) पर निर्भर करते हैं। स्टूडियो रॉड 5-50 मिलियन यूरो के बजट वाली मध्यम प्रस्तुतियों के लिए मानक बने हुए हैं।